जीवन के उदेश्य कैसे पूर्ण होते हैं?

यह जीवन को हम जी रहे हैं, ये केवल इस शरीर और इस शरीर को दिखने वाली वस्तुओं या विषयों से निर्मित नहीं है। हमारे इस जीवन में इससे कुछ ज्यादा है ।

वह ज्यादा क्या है? इस ज्यादा का हमारे जीवन और अस्तित्व पर क्या प्रभाव पड़ता है ? या यूं सोचें की क्यों सभी प्रयास और सभी भाव ठीक रखने के बाद भी कुछ अनिश्चितता क्यों बनी रहती है?

जीवन में , शरीर में, और इस सृष्टि में हर प्रकार की संरचना तीन प्रकार के प्रभावों या गुणों से की गई। जैसे, आध्यात्मिक, आधिदैविक और अधिभौतिक जीवन, शरीर और भाव। तीन प्रकार के गुण जिनके मेल से ये सृष्टि रची गई।

जैसे शरीर के लिए खाना, पीना और खेलना तीनों ही जरूरी है, इसी प्रकार इस जीवन में तीनों तरह के जीवन जीना भी जरूरी है। यहां तक कि हमारी बुद्धि की संरचना भी तीन भागों में है। दांया भाग, बंया भाग और छोटी बुद्धि जो पीछे की तरफ है।

अब आप इसे ये ऐसे समझो की बंया भाग जो शरीर के दांए भाग को संभालता है , वह आपका भौतिक जीवन में कर्म के लिए सक्षमता प्रदान करता है। दांया भाग जिसे हम कहते हैं कि काम नहीं करता , वास्तव में वह आधिदैविक विचारों का संचार कर हमें यह समझाता है की किया जाने वाला कार्य गलत तो नहीं और हमे यह भी समझाता है कि ठीक रास्ता क्या है। इसे हम इंस्टिंक्ट भी कह देते है या फिर छठी इंद्री।इसीलिए बंया भाग सदैव दांए भाग के अपने पार्टनर की मदद करता है। जैसे कोई थोड़ी भारी वजन उठाओ तो पहला परिश्रम दांया हाथ करता है और बंया हाथ उसके नीचे या साथ में स्वतः ही a जाता है। इस भाग में स्थित इन्द्रियों में हम देवताओं का वास कहते है। यह भाग उनका माध्यम है, हमारी मदद करने हेतु।

पीछे स्थित बुद्धि के भाग को हम हमेशा ये समझते हैं कि वह वास्तव में, हमारे लिए अपने हिसाब से काम करता है और हमारा उस पर कोई कंट्रोल नहीं होता। हम यह भी कहते हैं ये भाग अगर जागृत हो तो इंसान सब तरह की जादुई शक्तियों का प्रयोग करने में भी सक्षम होता है।

इसे ऐसे समझना चाहिए कि यह भाग वास्तव में आध्यात्मिक जीवन जीने में हमारा लिंक प्रभु से बना कर कर रखता है और इसके माध्यम से प्रेरणा मिलती है, ज्ञान मिलता है या यूं कहें कि हमें प्रभु के, या विधि के विधान के आदेश आते हैं।

अब अगर हम ये समझ पाएं की हम तीनो तरह के जीवन साध कर अपने भाव और व्यक्तित्व में ऐसे सुधार ला सकते है की जीवन में को भी उद्देश्य हो, उसे पूर्ण करने के लिए हम सक्षम हो सकते हैं। तत्पश्चात सभी उद्देश्य साकार होने में तीनो तरह की बुद्घियों का उपयोग करेंगे।

जब ऐसा होता है, तो हम ये कहते हैं कि हमें प्रभु का सानिध्य प्राप्त हो गया, सरल भाषा में लक साथ देने लगा।

इन सभी को साधने के लिए हमें सिर्फ अपने भावों पर नियंत्रण रखना होता है। जिससे हम अपने कार्य करते समय सभी निर्णय ठीक प्रकार से लेकर चलते हैं तो हमारे ना जो सकने वाले कार्यों में भी हमें ईश्वर की मदद मिलने लगती है यानी लक साथ देने लगता है।

जय श्री राधे।।। नारायण दृष्टि

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