कोई भी कर्म गलत क्यों हो जाता है ?

आज हम हिन्दू हो कर हम अपना इतिहास, भूगोल, शास्त्र, वेद और पुराण में व्यक्त अभिव्यक्तियां ना ही जानते हैं और ना ही समझते हैं। क्योंकि इनका पठन पाठन बाहर से आए हुए शासकों ने समय समय पर वर्जित किया और इसका अध्ययन नहीं करने दिया ।

जैसे कि, हम प्रेम को प्रणय और प्रणय को अनेतिक संबंध बनाना ही समझते हैं। आज के इस युग में जो की कलयुग कहा गया और जिसमें सब उल्टा होता है, यानी आसुरी शक्तियों के अनुरूप होता है। हम अपने धार्मिक संकल्प और शास्त्रों में दिए गए सांस्कृतिक मूल्यों को खो चुके है। यहां तक कि शास्त्रों के जानकार भी आजकल इसी कलयुग के प्रभाव में आ कर सिर्फ ज्योतिष विज्ञान और गायत्री मंत्रों का सहारा ले कर यजमान को लूटना और गलत शिक्षा दे कर उनके लिए स्वयं पूजा का आयोजन करना जानते हैं।

हमे ये नहीं ज्ञात की हर यज्ञ और हवन , या संकल्प लेकर की जाने वाली पूजा का एक अलग आधारित पथ भी होता है, जिसको करके हम पंडित के द्वारा की गई पूजा से ज्यादा अच्छा फल और कहीं ज्यादा आशीर्वाद पा सकते हैं।

समझने वाली बात यह है कि हमारा ज्ञान इतना क्षीण है की इन सांसारिक बंधनों और दिनचर्या में लगे रह कर हमे कुछ और सूझता ही नहीं। हम इतने निराश होते हैं कि हमे कोई भी कार्य जिससे भौतिक या शारीरिक सुख मिले उसे ढूंढ़ कर उसे करना पसंद करते हैं।

उसमे सबसे सरल रास्ता है मित्रों के साथ शराब पीना, नॉनवेज खाना और अनैतिक संबंध स्थापित कर लेना। जबकि इन सभी चीज़ों से घर में और हमारे जीवन में कलेश सिर्फ बढ़ता ही है, और हमे ये हम भाली भांति ज्ञात भी होता है, फिर भी उस कर्म को करने से अपने आपको रोक नहीं पाते।

हम ये भूल जाते हैं, की गलत भाव से किया गया कोई भी कार्य अगर हम छुपाना भी चांहे तो अपने निर्धारित समय पर वह उजागर हो ही जाता है।

यहां हमे वापस अपने 5 गुण जो हमने पहले पढ़े उनका ध्यान कर लेना चाहिए।

कर्म, धर्म, सय्यम, निष्ठा, और प्रेम अथवा प्रणय।

अगर हम गृहस्थ हैं और फिर भी जीवन के किसी मोड़ पर ऐसा अवसर आए की आपका किसी अनजान के साथ संबंध स्थापित होने लगे, तो वह संबंध ठीक है या अनेतिक ये ज्ञात करने हेतु हमे ये पांच गुण नाप लेने चाहिए। अगर वह संबंध स्थापित करना धर्म के अनुसार है , और आप अपने परिवार कि ओर निष्ठा और सय्यम नहीं खो रहे और आपका प्रेम सभी के लिए पूर्ण रूप से शुद्ध और ह्यदय पवित्र है तो इस कर्म को करने से आपका अहित नहीं होगा।

अगर यह कर्म केवल निराशा को मिटाने अथवा अपने स्वार्थ को पूरा करने तक ही सीमित है तो यह गलत भी है और निश्चित यह संसार के समक्ष उजागर भी होगा।

नारायण दृष्टि

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